: ढोल-मंजीरे की थाप व जसगीत के साथ जोत-जवारा विसर्जित
Thu, Apr 18, 2024
ढोल-मंजीरे की थाप व जसगीत के साथ जोत-जवारा विसर्जित
सेलूद। नवरात्रि पर देवी मंदिरों एवं घरों में जलाए गए जोत और जवारा का बुधवार को तालाबों में विसर्जन हुआ। ढोल-मंजीरे की थाप और जसगीत के बीच श्रद्घालु देवी मंदिरों से जोत और जवारा लेकर निकले और देर शाम तक इनका विर्सजन किया। सेलूद अंचल में पिछले आठ दिनों से नवरात्र पर्व श्रद्घापूर्वक मनाया गया। नवरात्रि पर मंदिरों में जोत जलाए गए थे और जंवारा बोये गए थे। इनका विर्सजन का दौर आज पूरे दिनभर चला। जोत कलश व जंवारा सिर पर धारण कर महिलाएं कतारबद्घ होकर चल रही थी। उनके सामने गाजे बाजे के साथ जसगीत मंडलियां माता का जस गान करने हुए चल रही थी। इस दौरान कई महिलाएं और पुरूष देवी विराजमान होने की वजह से झूमते हुए मिले। बैगाओं की देखरेख में जोत जंवारा विसर्जित की गई।
तालाबों में विर्सजन देखने उमड़ी भीड़
सेलूद के शीतला मंदिर में प्रज्ज्वलित जोत और जवारा का विर्सजन बुधवार को दोपहर में किया गया। इसी तरह अचानकपुर के दंतेश्वरी मंदिर एवं शीतला मंदिर, ढौर,चुनकट्टा,
गोंडपेन्ड्री,धौराभांठा,पतोरा,छाटा, बोहारडीह,महकाकला, महकाखुर्द, देउरझाल में भी जोत जंवारा का विसर्जन हुआ । इस दौरान तालाबों में विसर्जन देखने बड़ी संख्या में श्रद्घालु जुटे।
छत्तीसगढ़ परंपरा की दिखी झलक
विसर्जन के बाद तालाबों में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक नजारा भी सामने आया। यहां लोगों ने एक दूसरे के कानों में जवारा लगाकर जंवारा बदने की परंपरा भी निभाई। ऐसा कर वे एक दूसरे के सुख-दुख के साथी होने के बंधन से जुुड़ गए जिसे जीवनपर्यंत निभाना पड़ता है।
: मां बम्लेश्वरी के मस्तक पर सजा सोने का मुकुट
Sat, Apr 13, 2024
डोंगरगढ़।
चैत्र नवरात्र का आज पांचवा दिन है। आज नव दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप की पूजा की जाती है। इसी शुभ अवसर में आज मां बमलेश्वरी ट्रस्ट समिति एवं भक्तों के सहयोग से माता जी को लगभग 450 ग्राम सोने से बनी मुकुट भेंट की गई। इसकी लागत लगभग 35 लाख रुपए बताई जा रही है, जो पूरे नवरात्र में भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
माता के दरबार में लाखों की संख्या में देश विदेश से दर्शनार्थी आते हैं। कुछ अपनी मनोकामना पूरी होने पर तो कुछ मनोकामना लेकर माता के दरबार में अपनी हाजरी लगाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु ज्योति कलश की स्थापना करवाते हैं तो कुछ पैदल चलकर या घुटनों के बल माता के दरबार पहुंचते हैं।
मां बमलेश्वरी ट्रस्ट समिति की नई बॉडी जब से पद ग्रहण की तब से माता के दरबार में कुछ न कुछ नया देखने को मिल रहा है। पहले माता के दरबार को सोने से सुसज्जित किया गया, फिर रोपवे में एयर कंडीशनर वेटिंग हॉल, फिर 100 बिस्तरों का सर्व सुविधा युक्त अस्पताल तैयार किया गया। मां बमलेश्वरी ट्रस्ट समिति द्वारा संचालित अस्पताल में हर महीने की 15 तारीख को आखों का निशुल्क ऑपरेशन और लेन्स प्रत्यारोपण किया जाता है। इसमें बाहर से आए आंखों के विशेषज्ञ लेन्स प्रत्यारोपण का काम करते हैं।
माता का दरबार प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। पहाड़ी पर विराजमान मां बम्लाई के दर्शन के लिए लगभग 1000 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़कर जाना होता है। बीच-बीच में श्रद्धालुओं के बैठने की व्यवस्था की गई है। ऊपर तक बाजार लगा हुआ है। वहीं ऊपर जाने के लिए रोप वे की भी सुविधा मिलती है। सुरक्षा के लिए मंदिर परिसर में सुरक्षाबल भी तैनात रहते हैं। मंदिर समिति और पुलिस 24 घंटे सेवाएं देती हैं। जैसे-जैसे दर्शनार्थी ऊपर चढ़ते हैं मन आनंदित हो उठता है। इतनी लंबी चढ़ाई के बाद भक्तजन माता की छवि देखकर धन्य महसूस करते हैं।
मां बम्लेश्वरी मंदिर का इतिहास
मां बम्लेश्वरी मंदिर का इतिहास 2200 वर्ष पुराना है। डोंगरगढ़ शहर पहले कामावती नगरी के नाम से जाना जाता था। डोंगरगढ़ की पहाड़ी 2 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर मां बम्लेश्वरी के दर्शन के लिए लगभग 1 हजार से ज्यादा सीढ़ियों को पार करके या रोपवे की मदद से ऊपर जाते हैं।
राजा कामसेन ने बनवाया भव्य मंदिर
मंदिर निर्माण की बात करें तो राजा कामसेन ने अपने तपोबल से मां बगलामुखी को प्रसन्न किया और उनसे विनती की कि, वे उनके राज्य की सबसे ऊंची पहाड़ी पर विराजमान हों और सबका कल्याण करें। लेकिन अत्यधिक जंगल और दुर्गम रास्ता होने के कारण भक्त माता का दर्शन नहीं कर पा रहे थे। तब राजा कामसेन ने माता बम्लेश्वरी से विनती की और कहा कि, पहाड़ी के नीचे विराजमान हों। माता ने राजा की विनती सुन कर छोटी मां बम्लेश्वरी और मंझली मां रणचंडी के रूप में विराजमान हुईं। वही दूसरी ओर कुछ इतिहासकारों का यह भी कहना है की मां बम्लेश्वरी का इतिहास उज्जैन से भी जुड़ा हुआ हैं । राजा विक्रमादित्य भी यहां पहले शासक रह चुके हैं राजा विक्रमादित्य भी मां बगलामुखी के बड़े उपासक रहे हैं।
: नवरात्रि में 9 दिन का उपवास शरीर के लिए है कितना फायदेमंद, व्रत से पहले ऐसे करें बॉडी को तैयार
Mon, Apr 8, 2024
कल से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होने जा रही है। अगले 9 दिन तक लोग पूजा-उपवास और उपवास करेंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये कि इन 9 दिन के व्रत के लिए आपका शरीर कितना तैयार है। आप तंदुरुस्त रहेंगे तभी अच्छे से उपवास रख पाएंगे। इसलिए जरुरी है कि चैत्र महीने की इस नवरात्र से पहले बॉडी को डिटॉक्स कर लें। व्रत के लिए शरीर को तैयार करें, ताकि 9 दिन की फास्टिंग में पाचन ठीक रहे और लिवर की ताकत बढ़े।
अब तो Scientifically भी ये बात साबित हो गई है कि फास्ट रखने से एक खास तरह का प्रोटीन बनता है, जो लिवर के फैटी एसिड और मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करता है। इतना ही नहीं व्रत से कई तरह की बीमारियों का जोखिम भी कम करने में मदद मिलती है। एक स्टडी के मुताबिक नॉन एल्कोहलिक फैटी लिवर के मरीजों को तीन महीने तक एक दिन छोड़कर उपवास के साथ रोज वर्कआउट करवाया गया। नतीजा ये निकला कि लिवर फैट में कमी आई और इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ गई। मतलब लिवर तो फिट हुआ ही ब्लड शुगर भी हेल्दी लेवल पर आ गया।
भारत में हर चौथे शख्स का लिवर फैटी हैऔर ऐसे में ये नवरात्र का मौका सबसे सही है। कि बॉडी को डिटॉक्स करें और जिगर को हेल्दी बनाएं। योगगुरु स्वामी रामदेव से शरीर को प्यूरिफाई करने का सही तरीका जानते हैं और साथ ही जानेंगे कि इन नौ दिनों के व्रत में कितना और क्या खाएं?
फैटी लिवर के लक्षण
यूरिन का पीला रंग
ज्यादा थकान
पेट दर्द
पीली आंखें
पीली स्किन
भूख ना लगना
फैटी लिवर बन रहा है साइलेंट किलर
फैटी लिवर एक तरह की मेडिकल कंडीशन
जिसमें लिवर में फैट का जमाव होता है
फैट कंट्रोल नहीं होने पर लिवर डैमेज होता है
फैटी लिवर के क्या है कारण?
अनहेल्दी लाइफ स्टाइल
एल्कोहल-स्मोकिंगकी आदत
दवाइयों का ज्यादा सेवन
वायरल इंफेक्शन
हेपेटाइटिस सी
हाई कोलेस्ट्रॉल
मोटापा
थायराइड
स्लीप एप्निया
इनडायजेशन
लिवर को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
शुगर कंट्रोल करें
वज़न कम करें
लाइफस्टाइल बदले
कोलेस्ट्रॉल लेवल घटाएं
यंग एज से रखें
लिवर का ख्याल
शाकाहारी खाना खाएं
प्लांट बेस्ड फूड खाएं
मौसमी फल
साबुत अनाज
लो फैट डेयरी प्रोडक्ट